अंधा बांटे रेवड़ी

पिछले दिनों की बात है,
रास्ते से गुज़र रहा था,
एक जगह पर भीड़ लगी थी,

बीचोबीच एक आदमी

नज़र आ रहा था।

पास खड़े एक व्यक्ति से पूछा,

भाई साहब!

वो आदमी भीड़ में क्या,

भाषण झाड़ रहा है ?

उसने कहा,"नहीं,

रेवडिया बांट रहा है।"

 

मैं भी घुस गया भीड़ मे,

एक अदद रेवड़ी की चाह में।

बरसों पहले मिली थी एक,

इसी तरह की एक भीड़ मे,

बांट रहा था एक अंधा,

घूम घूम कर, छू छू कर

अपनों का कंधा।

 

आखिर गलती हो गई।

अंधे की नज़र चूकी और

एक रेवड़ी मेरी

झोली में टप से गिरी,

जिसका स्वाद

आज तक चख रहा हूँ।

 

आज बरसों बाद

फिर मौका मिला है।

रेवडिया समेटने का।

मिलेगी और

ढ़ेर सारी मिलेगी।

क्योंकि अब तो मेरे पास

रेवड़िया लेने के लिये

योग्यता है,

अनुभव है और

क्षमता भी है।

और सबसे बड़ी बात तो

यह है कि

रेवड़िया बांटने वाला

अंधा नहीं है।

 

खड़ा हो गया कतार में,

रेवड़ियों की इंतजार में।

लेकिन यह क्या ?

बांटने वाला आया मेरे पास,

एक बार, दो बार नहीं,

दसियों बार।

 

लेकिन हर बार

वह आता मेरे पास,

देखता वह मुझे

ऊपर से नीचे तक, और

आगे बढ़ जाता।

मेरा नाम उसकी किसी भी

सूची में नहीं था।

खड़े खड़े थक गया,

थक कर चूर हो गया।

लेकिन एक भी रेवड़ी

न मिलनी थी, न मिली।

 

सोचने लगा

काश!

अच्छा होता अगर

रेवड़ियां बांटने का काम

अंधों के पास ही

रहने दिया होता।

शायद अंधे की नज़र चूकती

और

एक आध रेवड़ी

मेरी झोली में फिर गिर जाती।

 

"सत्येश भण्ड़ारी"