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रावण बनाम महारावण |
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रावण के पुतले ने दशहरे के दिन पूरे देश में जलने से मना कर दिया | नेताजी, जलते हुए तीर पर तीर चला रहे है, पररावण है कि जलता ही नहीं |
एक शिष्ट मंडल भेजा गया | भाई ! जल जाओ, हमारी इज्जत का सवाल है | वैसे क्या फर्क पड़ता है, कल से तो तुम फिर जनता के बीच होंगे | हर तरफ तो लंका राज्य है, जहाँ बस रावण ही रावण राज्य करते हैं | तुम्हें तो केवल नाम के लिये मरना है , एक प्रतीक स्वरूप, वरना न तुम कभी मरे थे, और न कभी मरोगे | भाई ! अब बस कृपा करो, जल्दी से मर जाओ |
रावण दुखी हो गया और बोला, मुझे जलने में कोई दिक्कत या परेशानी नहीं | बल्कि मैं तो हर वर्ष एक छोटे बच्चे के हाथ ही
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मर जाता था, जो कि राम का रूप धर कर आता था | लेकिन आज यह क्या हो गया, मुझे उससे मरने को कह रहे हो, जो करोड़ो के घोटाले में फंसा है, जघन्य हत्या, मारपीट और बलात्कार का आरोपी है |
यदि केवल एक सीता को लाकर सम्मान पूर्वक लंका में रखने से मैं रावण बन गया तो ये सब तो महा महा महारावण है, इनके हाथों मरने से तो चुल्लु भर पानी में नाक डुबोकर मर जाना बेहतर समझता हूं |
जाओ लौट जाओ, नहीं मरना है मुझे इन महारावणों के हाथों ! यदि मारना है मुझे प्रतीक स्वरूप तो एक निष्पाप दुधमुंहे बच्चे को भी भेज दोगे तो मैं खुशी खुशी मर जाऊंगा, लेकिन शाम भर या रात भर तीर चलाओगे, तो भी मैं इन महारावणों से नहीं मरूंगा |
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