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अरे ओ हाथी ! एक चूहा तुम्हें पिछले पचास वर्षों से तंग कर रहा है। तुम्हारी छाती पर मूंग दल रहा है। अपने दांत किटकिटाकर, पूंछ पटक पटक कर गालियां दे रहा है।
तुम्हारे घर के एक हरियाले कोने में जबरदस्ती अपना एक बिल बना लिया है। तुम्हारे इस हरियाले कोने को, हड़पने की आशा कर रहा है। तुम्हारे घर में रहने वाले कुछ कीड़े मकोड़ों को, सिखा पढ़ाकर तुम्हे काटने को उकसा रहा है। उनके काटने का मामूली सा दर्द तुम वर्षो से महसूस कर रहे हो।
तुम्हारे धीर गम्भीर व्यवहार को वह तुम्हारी कायरता समझता है। पीठ पीछे से तुम्हे हरदम छेडता रहता है। अपनी आदत से मज़बूर यह चूहा जंगल के दूसरे जानवरों से, जंगली भेडियों और चालाक चीतों से मदद मांगता रहता है, तुम्हे परेशान करने के लिये।
जब जब भी जंगल की पंचायत बैठती है, हर वक्त यह चूहा, मानव अधिकारों के नाम पर तुम्हारे ऊपर कीचड़ उछालता रहता है। यह बात और है कि चूहे का फैंका वह कीचड़ कभी भी तुम्हारे पांव की ऊंचाई भी पार नहीं कर पाया।
इतना सब होने पर भी बार बार बुलाते हो उसे उसके एजेंटो को, समस्या सुलझाने को। बात कर रहे हो उससे, अपने घर में, उसके घर में, या फिर विदेशी जमीन पर, |
एक बार , दो बार नहीं, दसियों बार, बिना किसी परिणाम के।
" शिखर समझौता" भी किया,तुमने उस चूहे के साथ! क्या हुआ ? कुतर कुतर कर रद्दी में बदल दिया उसने पिछले तीस बरसों में।
हर जीव के पास सब्र का एक प्याला होता है। किसी के पास छोटा तो किसी के पास बड़ा। लेकिन तुम्हारे प्याले के नीचे या तो छेद है या उसकी जगह अथाह पात्र है, जो कभी भरता ही नहीं।
अरे सब्र का प्याला तो भगवान कृष्ण का भी भर गया था मात्र पांच मिनट में, सिर्फ सौ गालियां सुनकर।
तुम्हारे ये "अग्नि" और "पृथ्वी" अंश मात्र भी डर पैदा नहीं कर पाये, उस चूहे के दिल में।
पांच पांच न्यूक्लियर विस्फोट! पूरी दुनिया ने सुनी, उन धमाकों की आवाज़। बदले में पटाखे चला दिये उसने।
उधर वह सीमा पार से गोलियां चला रहा है, और तुम उसके बच्चों को क्रिकेट खेलने बुला रहे हो !
अगर इसी प्रकार चुप रहे तुम तो यह चूहा, अपनी झूठी बातों से, जंगल की पंचायत से कोई जागली फैसला करवा सकता है। तुम्हारे घर के कोने कोने में अपने बिल बनाकर तुम्हारे घर के चप्पे चप्पे को खोखला कर सकता है। तब तुम्हारा पैर तुम्हारे ही घर की जमीन में धंस जायेगा, और तुम असहाय से देखते रहोगे, चूहे के भेजे उन आतंकवादी विषैले कीड़े मकोड़ों को तुम्हारे ही शरीर के अंगों को निर्जीव समझ कर नोंच नोंच कर खाते हुए।
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