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दिल में कुछ हरारत हुई, तबीयत कुछ नासाज़ हुई, कुछ पसीना सा छूटा, औरकुछ चक्कर से आये। मित्रों की राय से ,डाक्टर के पास आये।
डाक्टर पहचान का था ,देखते ही खुश हुआ, एक बार फिर मुर्गा फंसा, बोला आइये आइये , इंजीनियर साहब!कैसे भूल पड़े रास्ता !
हर आदमी की एक पहचान होती है। नाम से , काम सेया फिर जाति से।
डाक्टर ने चेकअप किया ,कुछ टेस्ट करवाने को कहा। बोला चिन्ता न करें ,शर्मा जी, सब ठीक हो जायेगा।
मित्र के साथ ,टेस्ट करवाने गये तो, टेक्निशियन ने पर्चा देखा, बोला पेशेंट किधर है ? मित्र चौंके, वह फिर बोला, पेशेंट को वहां लिटाइये।
पहचान बदल गयी। इंजीनियर साहब या शर्मा जी ,अब पेशेंट हो गये।
मर्ज कुछ गम्भीर था ,अस्पताल में भर्ती होना पडा। इंजीनियर साहब ,बिस्तर पर पड़े पड़े, रोज़ दिन में तीन बार मोटी मेट्रन की कड़कती आवाज़ सुनते ,बेड़ नम्बर सतरह को इंजेक्शन देना है। |
पहचान फिर बदल गयी। अब पहचान रह गई, सिर्फ बेड़ नम्बर सतरह। न इंजीनियर साहब, न शर्मा जी, और न पेशेंट ।
मर्ज बढ़ता गया, इलाज चलता रहा, मगर अफ़सोस! भगवान को कुछ और ही मंजूर था। दसियों डाक्टरों , नर्सों औररिश्तेदारों के सामने ,देखते देखते इंजीनियर साहब ,भगवान को प्यारे हो गये।
अभी आधा घंटा भी न बीता होगा कि कंपाउंडर चिल्लाया ,लाश को जल्दी हटाइये। बेड़ को खाली कीजिये। पहचान फिर बदल गयी। अब पहचान रह गयी ,"सिर्फ लाश!"
न बेड़ नम्बर सतरह। न इंजीनियर साहब ,न शर्मा जी, औरन पेशेंट ।
आखिर क्यों लड़ते हैं ,झगड़ते हैं, सब अपने नाम के लिये। बड़ा गुस्सा आता है सबको ,जब कोई नाम का गलत उच्चारण मात्र करता है।
आखिर अन्त में तो ,सबका एक ही, नाम रह जाना है। एक ही पहचान रह जानी है सबकी। "लाश" बस सिर्फ एक "लाश" |