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काठ की हांड़ी |
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कौन कहता है काठ की हांडी में खाना दुबारा नहीं बन सकता।
गलत कहते हैं सब, एकदम गलत।
मैंने देखा है, कई बार देखा है, हजार बार देखा है, |
उन्हीं चेहरों को अपने घिसे पिटे वादों की मसालेदार खिचड़ी उसी काठ की हांडी में बार बार हर चुनाव के पहले पकाकर एक नई तश्तरी में परोसकर खिलाते हुए। |