काठ की हांड़ी

कौन कहता है

काठ की हांडी में

खाना दुबारा नहीं

बन सकता।

 

गलत कहते हैं सब,

एकदम गलत।

 

मैंने देखा है,

कई बार देखा है,

हजार बार देखा है,

उन्हीं चेहरों को

अपने घिसे पिटे वादों की

मसालेदार खिचड़ी

उसी काठ की हांडी में

बार बार

हर चुनाव के पहले पकाकर

एक नई तश्तरी में

परोसकर खिलाते हुए।