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"गांधी का गुजरात" या "गुजरात का गांधी" |
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अपने जन्मदिन पर स्वर्ग से झांककर बापू ने अपनी कर्मभूमि अपनी अहिंसा की रणभूमि को हस़रत भरी नज़रों से देखा। देखकर चक्कर से आये, मूर्छा छानि लगी, आंखो के आगे अंधेरा छा गया। दिखाई दिया उन्हें अधजले टूटे फूटे घर, सड़कों पर बिख़री जिन्दगियां, गोधरा का जला रेल का डिब्बा, अक्षरधाम की दीवारों पर बिखरे खून के धब्बे। वातावरण में गूंजती चीखें और चीत्कारें। कहीं दिशा भ्रम तो नहीं हो गया। गलत जगह को तो गुजरात नहीं समझ लिया। |
क्या यही है वह जगह,जहां अहिंसा को परम धर्म माना जाता था। " साबरमती कोपराई पीर की समझ थी। हिंसा दूर भागती थी, अहिंसा की छाया मात्र से। एक सीत्कार सी उठी। अगर यही वह गुजरात है, तो मेरे दोस्तों, मेरे भाईयों, मेरे सहोदरों] मेरे देशवासियों कृपा करो मुझपर, बन्द करो मुझे "गुजरात का गांधी" कहना। एक और कृपा करो मुझपर, मेरे दिल पर जो एक बोझ पड़ गया है ,आज हटा दो उसे। बन्द करो इस धरती को, " गांधी का गुजरात" कहना। |