फिल्म

शहर के सिनेमाघर के बाहर

गन्दे कचरे के ढ़ेर से

एक बकरा और बकरी

फिल्म की रील खा रहे थे,

बकरी के बच्चे दूर खड़े खड़े

भूख से ललचा रहे थे।

बीच बीच में वे पास आने की

कोशिश कर रहे थे, लेकिन

बकरा और बकरी दोनो उन्हें

भगा रहे थे।

 

मैं पास खड़ा खड़ा

यह सब देख रहा था, बोला

शर्म नहीं आती,

वहां बच्चे भूख से

मर रहे हैं और आप दोनो

यहां मजे से इस फिल्म को

चर रहे हैं।

बकरी बोली भाई साहब

हम कायदे कानून और

नियम से चलते हैं,

यह वयस्कों वाली फिल्म है,

ओनली फोर एडल्टस,

बच्चों को कैसे

खिला सकते हैं ?

मैंने बकरी से पूछा,

अच्छा बताओ कैसी लगी फिल्म ?

इस बार बकरी शरमा गई

और लजा गई ।

बकरा आगे आया बोला,

सच बताऊ साहब,

एक साल पहले

इसी फिल्म की कहानी वाला,

उपन्यास खाया था,

उसमें दस गुना अधिक

आनन्द आया था।

 

अरे ! बेशर्मी की हद हो गई,

जिन दृश्यों की फिल्म को

मेरी बकरी मेरे साथ खाते हुए

शरमा जाती है,

कैसे ये हिरोईने बेजिझक

उन दृश्यों के लिये,

सैंकड़ों लोगों के सामने

टेक पर टेक दे जाती है।