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इक्कीसवी शताब्दी में जाना है |
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सवेरे सवेरे एक साहब, हमारे पास आए और बोले दस रूपये दीजिये, मुझे इक्कीसवी शताब्दी में जाना है।
मैं बोला सिर्फ दस रूपये में ? वह बोला लोकल से जाउंगा। जी हां !एक वड़ा पाव खाऊंगा औरलोकल से जाउंगा।
मुम्बई की लोकल ट्रेन की दमघोंटू भीड़ से ,यदि बच पाऊंगा, तो सीधा इक्कीसवी सदी में, लैंड़ कर जाऊंगा। अगर दस रूपये आपको कम लगते हैं, तो सौ सौ के दस दे दीजिये। ताज़महल में लंच करूंगा, और टैक्सी से जाऊंगा।
मैं समझा नहीं पूछा,यह सब तुम कब से कर रहे हो ? और अब तक तो इक्कीसवी शताब्दी में पहुंचे नहीं ?
हिकारत भरी दृष्टि डाल कर बोले वे ,तुम्हारे जैसो से रोज़ दस दस रूपये लेकर दिन गुज़ार रहा हूं , औरइसी तरह इक्कीसवी सदी की ओर कदम बढ़ा रहा हूं।
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बड़ी हिम्मत के साथ अन्तिम बार पूछा, लेकिन क्यों जाना चाहते हो तुम इतनी जल्दी इक्कीसवी सदी में ?
इस बार दुखी हो गये वो !पलकों से गिरते आंसू रोक कर बोले, पढ़ा लिखा हूं, पी एच ड़ी किया है, मगर बेरोजगार हूं। मां बाप मेरी बेरोजगारी से परेश़ान हैं। रोज़ एक एक रूपया देते हुए हजारों ताने देते हैं।
दूसरी तरफ़ ये दुनिया वाले रोज इक्कीसवी सदी में जाने के लिये ,"वाय टू के" पर करोंड़ो रूपये खर्च कर देते हैं।
इक्कीसवी सदी में शायद ,यह महंगाई न हो, भ्रष्टाचार न हो, अनाचार न हो, एक वोट से गिरने वाली सरकार न हो। राजनीति में अपराध मिक्स न हो ,क्रिकेट का कोई मैच फिक्स न हो।
नई सदी का हर नया दिन ,शायद इतनी समस्याओं वाला न हो। लाइये !जल्दी से दस रूपये लाइये।न देना हो तो मत दीजिये ,मगर इस तरह मेरा दिमाग न खाइये। |