एकलव्य की वापसी

हे एकलव्य!

यदि तुम अपनी

अधूरी शिक्षा को

पूरा करने की अतृप्त इच्छा

और आकांक्षा लिये

इस धरती पर

वापस आना चाहते हो,

तो कृपया मत आना।

 

ऐसा नहीं कि यहां पर

द्रोणाचार्य नहीं हैं।

वे तो बहुत हैं।

एक दो नहीं हजारों हैं।

हर गली, नुक्कड़ और

चौराहे पर है।

छोटे बड़े हर पैमाने पर है।

 

लेकिन द्रोणाचार्य शिक्षा

आज भी

राजपुत्रों को ही देते हैं।

राजपुत्रों को तो अब भी

अभिमन्यु की तरह

गर्भ में ही

शिक्षा मिल जाती है।

एकलव्य के नसीब में

शिक्षा न तब थी,

न अब है।

 

द्रोणाचार्य आज भी

तैयार बैठे हें,

एकलव्यों का

अंगूठा काटने को।

 

इसलिये, हे एकलव्य!

अगर हिम्मत है तुममें,

अंगूठा काटकर

देने के बजाय

अंगूठा दिखाने की,

तो आना इस धरती पर।

वरना मत आना,

कभी मत आना।

 

क्योंकि इन

हजारों द्रोणाचार्यों को

काटकर देने के लिये,

इतने सारे

अंगूठे कहां से लाओगे।